उद्धरण - 62
सच पूछिए तो मैं भी आरम्भ में लेखन जीवी नहीं था । मेरी पहली पुस्तक जब छपी तब मैं जेल में सरकार की मेहमाननवाजी से लाभ उठा रहा था; और दूसरी पुस्तक यद्यपि छपी मेरे जेल से आ जाने के बाद तथापि प्रकाशक से उसके लिखा पढ़ी कुछ अनुग्रहशील सम्पादकों की मध्यस्थता से पहले ही हो गई थी ।
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