उद्धरण - 210

जिसे तुम प्रेम कहती हो वह धोखा है, उद्दीप्त लालसा का विकृत रूप, उसी तरह जैसे सन्यास केवल भीख माँगने का संस्कृत रूप है। सच्चा आनन्द, सच्ची शान्ति केवल सेवा-व्रत में है। वही अधिकार का स्त्रोत है, वही शक्ति का उद्गम है। सेवा ही वह सीमेण्ट है, जो दम्पति को जीवनपर्यन्त स्नेह और साहचर्य में जोड़े रख सकता है, जिस पर बड़े-बड़े आघातों का कोई असर नहीं होता। जहाँ सेवा का अभाव है, वहीं विवाह-विच्छेद है, परित्याग है, अविश्वास है।

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