उद्धरण - 130

हम अपने भीतर पका कर व्यथा को सौन्दर्य बनाते हैं- यही सृष्टि का रहस्य है, बल्कि यह तुम ने मुझे बताया था। पकाने में समय बीत जाता है, हम बूढ़े भी हो जा सकते हैं, परास्त भी हो सकते हैं, हमारी आकांक्षाएँ अधूरी भी रह जा सकती हैं- पर उस सब का कोई महत्व नहीं है, बूढ़े होने का नहीं, हारने का नहीं- महत्व है उस आन्तरिक शान्ति का जो पकने में मिलती है, उस तन्मयता का...मैं तो यही अनुभव करती हूँ।

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