उद्धरण - 267

उनीसवीं सदी बूढ़ी हो चली थी; बूढ़ा भारत देश गुलामी की नयी और कठिन बेड़ियों से जकड़कर भी जवान हो रहा था एक नयी राह पर दौड़ रहा था। लोहे की सड़कों का जाल धीरे-धीरे फैलता ही जा रहा था उन पर धुआँ-गाड़ियाँ भी माल-मुसाफिर लेकर दौड़ने लगी थीं।

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