उद्धरण - 66
तो कहूँ कि जो स्नेही या हितैषी हैं, या जिनका मन खुला है, या जिनमें शुद्ध जिज्ञासा है, उनके सामने जवाब देने का, उन्हें समझाने को, समाश्वस्त करने को, उनकी शंकाओं का समाधन या निवारण करने को, बराबर तैयार हूँ । जिनका स्नेह या विश्वास मुझे मिला है, उनके प्रति अपना दायित्व बहुत बड़ा मानता हूँ!
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