उद्धरण - 153
विवाह की ग्रन्थि दो के बीच की ग्रन्थि नहीं है, वह समाज के बीच की भी है। चाहने से ही वह क्या टूटती है! विवाह भावुकता का प्रश्न नहीं, व्यवस्था का प्रश्न है। वह प्रश्न क्या यों टाले टल सकता है? वह गाँठ है जो बँधी कि खुल नहीं सकती। टूट भले ही जाए, लेकिन टूटना कब किस का श्रेयस्कर है ?
Comments
Post a Comment