उद्धरण - 170
हम अपने भीतर पूरी तरह यह स्वीकार करने कि कभी भी यह समाप्त हो जा सकता है- यानि निस्संग हो जावें- और उतनी ही सम्पूर्णता से यह भी अनुभव करें कि वह समाप्त नहीं हुआ है, चल रहा है- यानि विस्मय में डूब जावें, मेरे निकट जीवनानन्द का यह नुस्खा है ।
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