उद्धरण - 175
‘प्रियता प्राण से ही तो प्रकट होती है तभी तो कहते हैं । प्राण-प्रिये! इसलिए प्राण ही प्रियता है । प्राण के प्रेम के कारण ही तो याज्ञिक जो व्यक्ति यज्ञ के योग्य नहीं उसे भी यज्ञ करा देते हैं जो दान देने योग्य नहीं उससे भी दान ले लेते हैं प्राण के प्रेम के कारण ही जहाँ जाते हैं। वहीं यह भय भी बना ही रहता है कि कही कोई मार न डाले ।
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