उद्धरण - 164

अगर यह अप्रीतिकर घोर कर्म करणीय है, और मैं अनिवार्य समझता हूँ कि वह किया जाये, चाहता हूँ कि वह किया जाये, तो तटस्थता अथवा उपेक्षा कैसे उचित है, यह कैसे क्षम्य है कि उसे मैं दूसरों पर छोड़ दूँ?

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