उद्धरण - 282

पर छोटी-बड़ी अड़तीस किताबें हैं-पहले भावों की उछालों में लिखी थीं फिर नाम की महत्वाकांक्षा में बाद में अपने परिवार के भरण-पोषण की समस्या हल करने के लिए। मुझे फुरसत ही कहाँ मिली जो अपने से उबरकर दूसरों के लिए सोचता।

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