उद्धरण - 110

‘यथार्थ की पकड़ की इस शब्द-बहुल चर्चा में, लोग दो चीजें मानकर चलते जान पड़ते हैं जो दोनों ही प्रश्नाधीन हैं- पहली यह कि ‘यथार्थ’ सब ‘बाहर’ होता है, सतह पर होता है, दूसरी यह कि यह इकहरा या एकस्तरीय होता है । जो दीखता नहीं है, या थोड़ा और आगे बढ़कर कह लें, कि जो गोचर नहीं है, वह यथार्थ नहीं है, यह एक नये प्रकार का अन्धापन है जिसे यथार्थ-बोध का नाम दिया जा रहा है ।’’

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