उद्धरण - 208

मेरे जेहन में औरत वफ़ा और त्याग की मूर्ति है, जो अपनी बेज़बानी से, अपनी कुर्बानी से, अपने को बिलकुल मिटाकर पति की आत्मा का अंश बन जाती है। देह पुरूष की रहती है पर आत्मा स्त्री की होती है।

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