उद्धरण - 211
मुझे लगता है बेटा, जिसे लोग ‘आत्मा‘ कहते हैं वह इसी जिजीविषा के भीतर कुछ होना चाहिए । वे जो बच्चे हैं । किसी की टाँग सूख गई है, किसी का पेट फूल गया है, किसी की आँख सूज गई है- ये जी जाएँ तो इनमें बड़े-बड़े ज्ञानी और उद्यमी बनने की सम्भावना है । सम्भावना की बात कर रही हूँ । अगर यह सम्भावना नहीं होती तो शायद जिजीविषा भी नहीं होती । आत्मा उन्ही अज्ञात- अपरिचित-अननुध्यात सम्भावनाओं का द्वार है ।
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