उद्धरण - 91
तो मानव यंत्र के सहारे उन्नति करता है और यंत्र को नैतिकता से कोई मतलब नहीं है, पर मानव ऐसा नहीं हो सकता कि उसे भी नैतिकता से कोई मतलब न रहे । यह तो हो सकता है कि वह कुछ अनैतिक करे, यह भी हो सकता है कि वह भरसक अनैतिक कुछ न करे । लेकिन नीति और अनीति के विचार से ही वह मुक्त हो जाए, यंत्र के साथ यंत्र हो जाए, ऐसा उसके लिए कम से कम अभी तक सम्भव नहीं हुआ है; और मैं आशा भी करता हूँ कि कभी सम्भव नहीं होगा ।
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