उद्धरण - 78

मर्द में वह सामर्थ्य ही नहीं है। वह अपने को मिटायेगा, तो शून्य हो जायेगा। वह किसी खोह में जा बैठेगा और सर्वात्मा में मिल जाने का स्वप्न देखेगा। वह तेजप्रधान जीव है, और अहंकार में यह समझकर कि वह ज्ञान का पुतला है, सीधा ईश्वर में लीन होने की कल्पना किया करता है। स्त्री पृथ्वी की भाँति धैर्यवान् है, शान्ति-सम्पन्न है, सहिष्णु है। पुरूष में नारी के गुण आ जाते हैं, तो वह महात्मा बन जाता है। नारी में पुरूष के गुण आ जाते हैं, तो वह कुलटा हो जाती है। पुरूष आकर्षित होता है स्त्री की ओर, जो सर्वांश में स्त्री हो।

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