उद्धरण - 94

आज का साहित्यकार अनुभव करता है कि उसकी कहीं जड़ें नहीं है, वह उच्छिन्न और अनाधार है, और इस प्रकार वह तात्कालिक परिस्थिति का खिलौना बन जाता है ।

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