उद्धरण - 151
स्नेह एक चिकना और परिव्यापक भाव है कि उसमें व्यक्तित्व नहीं रहते। स्नेही अपने स्नेह-पात्र को कभी ‘याद’ नहीं करता, क्योंकि वह उसे कभी भूलता नहीं, वह उससे इतना अभ्यस्त हो जाता है कि उसे कभी ध्यान नहीं होता कि इसे भी देखूँ, इसे देखने के लिए एक अलग, एक विशिष्ट प्रयत्न करूँ।
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