उद्धरण - 301
क्या सोचकर आखिर क्या सोचकर मैंने इस आदमी से शादी कर ली क्या मैं यह सोच रही थी कि शादी दो-चार रोज़ का खेल है कभी भी मन भरने या ऊबने पर इसे बन्द किया जा सकता है या छोड़ा जा सकता है और वापस वही हुआ जा सकता है जो हम पहले थे? क्या मैं यही सोच रही थी कि एक बार आज़माकर देख लेने में कोई हर्ज़ नहीं है क्योंकि जो दरवाज़ा मै छोड़कर आऊँगी वह हमेशा के खुला रहेगा और मैं कभी पीछे मुड़कर चार कदम चलूँगी और उस दरवाजे़ से अपनी चिर-परिचित पुरानी दुनिया में प्रवेश कर लूँगी और किसी को पता भी नहीं चलेगा कि मैं इस बीच क्या कर आयी हूँ क्या यही सोचकर मैने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी दे मारी थी या फिर आखिर क्या सोचकर
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