उद्धरण - 81

कलह के दानव क्षेत्र में आना चाहती हैं तो उससे समाज का कल्याण न होगा। मैं इस विषय में दृढ़ हूँ। पुरूष ने अपने अभिमान में अपनी कीर्ति को अधिक महत्व दिया। वह अपने भाई का स्वत्व छीनकर और उसका रक्त बहाकर समझने लगा, उसने बहुत बड़ी विजय पायी। जिन शिशुओं को देवियों ने अपने रक्त से सिरजा और पाला उन्हें बम और मशीनगन और सहस्त्रों टैकों का शिकार बनाकर वह अपने को विजेता समझता है। और जब हमारी ही माताएँ उसके माथे पर केसर का तिलक लगाकर और उसे अपनी असीसों का कवच पहनाकर हिंसा क्षेत्र में भेजती हैं, तो आश्चर्य है कि पुरूष ने विनाश को ही संसार के कल्याण की वस्तु समझा और उसकी हिंसा-प्रवृति दिन-दिन बढ़ती गयी और आज हम देख रहे हैं कि यह दानवता प्रचण्ड होकर समस्त संसार को रौंदती, प्रणियों को कुचलती, हरी-भरी खेतियों को जलाती और गुलज़ार बस्तियों को वीरान करती चली जाती है।

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