उद्धरण - 202
इसी प्रकार ‘नाम‘ से लेकर ‘आशा‘ तक सब आरे प्राण- रूपी चक्र में समर्पित हैं । सबकुछ प्राण के सहारे चल रहा है, प्राण को लक्ष्य में रखकर चल रहा है, प्राण ही पिता है, प्राण माता है, प्राण भ्राता है, प्राण भगिनी है, प्राण आचार्य है, प्राण ब्रह्मण है ।
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