उद्धरण - 137

बुढ़िया का कवच भी नीरन्ध्र नहीं है, कहीं उसमें भी टूट है- कहीं न कहीं वह भी मृत्यु से डरेगी और रिरियाकर कहेगी कि नहीं मैं मरना नहीं चाहती । एक प्रबल, दुर्दमनीय उल्लास, एक विजय का गर्व मेरे भीतर उमड़ आया ।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549