उद्धरण - 213

तपस्या का फल यही न होता है मेरे प्यारे, कि आदमी में कोई ममता न बचे, ‘मम‘(मेरा) कहा जानेवाला कुछ न रहे, वह तो तुम्हें अनायास विधाता की ओर से मिल गया था।

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