उद्धरण - 284
राजकाज की भाखा समझना तुम्हारे हमारे बस की नही है मातौन। काहे से कि जब तक हम एक बात समझ पाएँ तब तक तो हमारे नेता लोग चार पहेलियाँ और धर देते हैं हमारे सामने। वह भी ऐसे जैसे कुनैन को शक्कर में लपेट दिया हो। सरकार और विपक्षी दलों का गोरखधन्धा मछेरे का जाल-सा फैला है। कहाँ-कहाँ तक बचे आदमी।
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