उद्धरण - 385
स्निग्धा के अधैर्य से मैं परिचित न रहा होऊँ ऐसी बात नहीं थी। उसे हर चीज़ फटाफट चाहिए होती थी। इधर इच्छा हुई उधर चीज़ हाजिर। उसे इसी का अभ्यास था इसी का प्रशिक्षण। उसके लिए यही सहज दुनिया थी। जबकि वास्तविक दुनिया न ऐसी थी न हो सकती थी। ....यह सब नहीं होना था। क्योंकि स्निग्धा अपने पापा का घर हमेशा के लिए छोड़ आयी थी। क्योंकि उसमें धैर्य नामक चीज़ थी ही नहीं।
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