उद्धरण - 560

वह जानती थी कि ये कोने जब होते हैं तो कितने पैने होते हैं। कैसे इनसे सबकुछ कटता चलता है विश्वास सद्भावना अपनत्व! सारी की सारी ज़िंदगी बँट जाती है खंडो में, टुकड़ों में कि इसके बाद एक पूरी ज़िंदगी जीना नहीं वह अब और उस सबसे गुजरना भी नहीं चाहती। बड़ी से बड़ी कीमत भी चुकानी होगी तो चुका देगी।

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