उद्धरण - 538

तुम अपने हिस्से की लड़ाई दूसरों से लड़वा रही थी उसी की कीमत चुकानी पड़ी है। आपदाएँ ढकेल देने से खतम नहीं हो जातीं कुछ देर को ओझल होती हैं बस और फिर दूनी भयानकता से।

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