उद्धरण - 580

कामाचारी अर्थाचारी अथवा सदाचारी कोई भी हो इनका एकजुट होकर कोई भी सामूहिक आन्दोलन चलाना अनैतिकता है। हमारी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ ऊपरी तौर पर बहुतों से मेल खाने के बावजूद हमारे अन्दर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखती हैं। अस्ति की स्वीकारोक्ति ही यह है कि मैं हूँ और मैं हर हालत में दूसरे से भिन्न हूँ-अपने माता-पिता भाई-बन्द पत्नी-प्रेमिका मित्र-व्यवहारी इन सबसे मेरा अस्तित्व जुदा है। अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए मुझे केवल अपनी ही चिंता करनी चाहिए।

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