उद्धरण - 388
बिन्नू यह जल निरमल है या मैला? पवित्तर है या पाप का? इमरत है कि बिस? नहीं जानते हम। तुम्हारी रामायन में लिखा भी होगा तो लिखनेवाला यह नहीं जानता कि आदमी जब प्यासा होता है प्यास से मर रहा होता है तो कहाँ देखता है कहाँ सोचता है कहाँ करता है कोई भेद? कोई अन्तर ।
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