उद्धरण - 553

सौ बातों की एक बात अब पिरधानी भी ससुर व्यापार हो गई है जो ज्यादा-से-ज्यादा खरच सके सो बन जाओ पिरधान और फिर काट लो उसका चौगुना कि दस गुना पइसा। जे कहो बऊ कि बुद्वि-चतुरई के जमाने गए। अब तो कलदार कर रहा है राज। भरी जेब की महिमा है चारों तरफन।

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