उद्धरण - 520
उस रात पहली बार- बरसों बाद पहली बार- मुझे एक नागरिक के रूप में अपनी असहायता का और अपनी कमायी तमाम दौलत की निरर्थकता का तीख़ा बोध हुआ।.......पापा कभी नहीं समझ पाएँगे कि हमारी दुनिया एक विशाल दैत्याकार धमन भट्ठी बन चुकी है और हम तीनों अपने जैसे हजा़रों-लाखों की तरह उसमें ईंधन की तरह झोंक दिये गये हैं। बेटू छोटा था, भस्म हो गया। हमारे पूरी तरह भस्म होने में अभी कुछ और समय लगेगा।
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