उद्धरण - 488

विश्वास न करने से बदल तो नहीं जाएग कुछ। असल बात तो असल ही रहेगी। झुठलाने से क्या होगा। परदा डालने से अपनी आँखें ही तो छिपाई जा सकती हैं जो घटित हो रहा है उसे तिरोहित कैसे किया जा सकता है।

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