उद्धरण - 465
मल्टीस्टोरी कॉम्प्लेक्स बन जाते। पूंजी चलती-दौड़ती-उफ़नती-भागती दिखाई देती। कितना घोर अपव्यय! ज़मीन का, समय का, जीवन शक्ति का, संभावनाओं का। ...... कितना फालतू समय है इस देश के पास! कितनी संभावित सक्रियता, कितनी प्रसुप्त ऊर्जा, कितनी श्रमशक्ति, कितना जीवन ऐसे ही नष्ट हो रहा है, ऐेसे ही नष्ट हो जाएगा। अस्सी नब्बे प्रतिशत मानसिक शक्ति-शारीरिक शक्ति अनिवेशित ही रह जाएगी और देह चिता पर चढ़ा दी जाएगी।
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