उद्धरण - 417

सवेरे मन में जो एक अपराध-बोध था, भय था वह धीरे-धीरे गुस्से में बदलने लगा। अच्छा है कोई कुछ मत बताओ। मेरा क्या जाता है। मैं भी अपनी कोई बात नहीं बताऊँगा। इम्तिहान होगा तो यह भी नहीं बताऊँगा कि कैसा करके आया हूँ। तब पता लगेगा।

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