उद्धरण - 565

गाँव का जीता-जागता जीवन हमारे अपने हाथ में है। कच्ची मिट्टी की तरह मुलायम। इसे सँवारा जा सकता है। बार-बार गढ़ा जा सकता है। अनुपम रूप दिया जा सकता है। अपने अनुरूप दिया जा सकता है। अपने अनुरूप ढाला जा सकता है।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549