उद्धरण - 582

यह मेरा नहीं। जो कुछ मैं अर्पण कर रहा हूँ यह मेरा नहीं। ठीक तो है जहाँ आदमी पैदा होता है वहीं किसी कोने में नाल गाड़ी जाती है। उसकी कि इस आँगुर-भर धरती में इस जीव की जड़े हैं। फूलेंगी-फलेंगी। भले ही दुनिया के छोर पर चला जाय फिर भी नहीं भूली जाती अपनी भूमि नाम और मिट्टी। ....... इंसानियत के नाते ही सोच लो जिस धरती से तुम पैसा खुदवा रहे हो उस पर हम पसीना बहा लें बस। बेघर होने से बच जाएँगे। अपनी जड़ों से जुड़े रहकर हरे-भरे बने रहेंगे इस गाँव के लोग

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