उद्धरण - 425
दुनिया बहुत ज़ालिम है। वह मुफ़लिस पर हँसती है। उसे पटकती है। और जब वह कराहता है- रोता है- दया की गुहार करता है, तो और हँसती है। इन्सान का सबसे बड़ा गुनाह है कमजोर रहना, गरीब रहना, मुफ़लिस रहना। यह जिन्दगी का अपमान है। अपनी ज़ात का अपमान है। अपने इन्सान होने पर लानत है।
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