उद्धरण - 411

चेतना जिसकी स्वस्थ सबल और दृढ़ होगी कल्पना उतनी ही सुन्दर और बेदाग भी होगी। मैं अपने जीवन भर के कार्य ही को ईश्वर मान सकता हूँ। भावनात्मक रूप से और अधिक गतिमान और सत्यशील होते हुए मैं मनुष्य में भगवान के अस्तित्व को स्वीकार कर सकता हूँ।

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