उद्धरण - 370

तब मैंने एक चीज़ डिस्कवर की। रोहित कंजूस है। बेहद कंजूस मक्खीचूस....होता क्या है इनमें सेलखड़ी और सुगंध। कोई तीसरी चीज़ होती हो तो बताओ। यह था उसका तर्क। ज़ाहिर है ऐसे में उसे पर्फ्यूम और डियोड्रेण्ट तो बिलकुल ही बेकार की चीजे़ं लगती....उसके मन में ऐसे ही तिरस्कारपूर्ण विचार होंगे जो उसने कभी व्यक्त नहीं किये लेकिन अपने तिरस्कारपूर्ण मौन से यह जरूर जता दिया कि या तो मुझे इन चीजों को प्रयोग छोड़ना पड़ेगा या इनकी व्यवस्था अपने बूते पर करनी पड़ेगी। उसकी कमाई से यह सब नहीं आएगा।

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