उद्धरण - 476

लच्छू भी गरीब के सताये रूप्पन महाजन और उसके कारिन्दों के मारे हुए शोषित समाज ही का एक अंग है। और इस लाल सितारे में इस क्रान्ति के तीर्थ मास्को में उसे एक तरह से अपनी जीत की आस्थायुक्त भावना मिल रही है। बड़ा पढ़ाकू न होते हुए भी उसने ताल्सतोय तुर्गनेव दोस्तायव्स्की चेखोव गोर्की और शोलोखोव की थोड़ी-बहुत किताबें सारसलेक में पढ़ी है।

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