उद्धरण - 367

दस वर्ष का यह विवाहित जीवन-एक अँधेरी सुरंग में चलते चले जाने की अनुभूति से भिन्न न था। आज जैसे एकाएक वह उसके अंतिम छोर पर आ गई है। पर आ पहुँचने का संतोष भी तो नहीं है ढकेल दिए जाने की विवश कचोट-भर है। पर कैसा है यह छोर? न प्रकाश न वह खुलापन न मुक्ति का एहसास। लगता है जैसे इस सुरंग ने उसे एक दूसरी सुरंग के मुहाने पर छोड़ दिया है- फिर एक और यात्रा वैसा ही अंधकार वैसा ही अकेलापन।

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