उद्धरण - 314
वोट देने की बात तो भइया ऐसी ही हुई जैसे कड़वी ककड़ी को पेट में रखे रहें। कंठ में लौटा-लौटाकर जुगाली करते रहें और जोड़ते रहें विष। पचाते रहें चुनाव तक। और चुनाव के दिन मोहर ठोक के कागज घोंपि आए मतपेटिका में। कर दिया पीठ पर वार। काढ़ लिया बदला।
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