उद्धरण - 561

घबराते नहीं मन्दाकिनी! क्या नहीं हो पाएगा? सब कुछ होगा। जितना सम्भव होगा कोशिश करेंगे। तुम क्या सोच रही हो अस्तपाल चलने डॉक्टर आ जाने से मिट जाएँगे सारे दर्द? आदमी हो जाएगा निरोग? बिटिया रूग्ण तो आदमी की आत्मा भी है उसके निवारण की दवा कहाँ खोजोगी? रोगी हमारी व्यवस्था है उसे भी सँभालोगी? क्षयग्रस्त हमारा समाज है सुधारने का यत्न करोगी?

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549