उद्धरण - 428
इतेक नहीं समझते कि हिफाजत की कितेक बड़ी कीमत होत है? चाहे राजा से परजा को मिले चाहे पुरिख से जनी को बात एक ही है। ताबेदारी एक ही सी करनी परती है। और जई ताबेदारी के चलते फजीहत और बिटम्ना भी। क्या जानें किस मोल बिकी हो प्रेम? क्या-क्या सह-झेल रही हो? और कौन कगार से भेजनी परी हो जे पिराथना?
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