उद्धरण - 375

मेरी ही नहीं अपनी जरूरतों के प्रति भी उसका रवैया एकदम अड़ियल बूढ़ों जैसा था। लेटरीन के लिए अलग चप्पल होनी चाहिए उसे समझ नहीं आता क्यों....घर की जो हालत थी ऐसी कि मैं किसी फ्रेण्ड को अपने घर भी नहीं बुला सकती थी।....नींबू-मिर्च-धनिया-टमाटर-अदरक आदि खरीदना तो उसे बिलकुल फिजूलखर्ची लगता। एक बार प्याज़ महँगी हो गयी तो उसने प्याज़ खरीदना ही छोड़ दिया। क्या हुआ जैन लोग भी तो नहीं खाते।....धीरे-धीरे मैं डरने लगी। घर में कोई चीज़ खत्म हो जाती तो यह बताते मैं डरती कि अमुक चीज़ ख़त्म हो गयी है। क्या।

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