उद्धरण - 557

मानस-जनम बार बार नहीं मिलता। देवयोनि से बड़़ी है मनुष्य-योनि। प्रभामंडल के बीच सत्पुरूष बने रहना सरल है। सांसारिक पाप-पुण्य सत्-असत् ज्योति और अन्धकार से गुजरकर परमारथ करना कठिन तप है।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549