उद्धरण - 363

यह कण्व का आश्रम तो नहीं था और न ही शकुन्तला की विदाई का अवसर किन्तु घरवालों को लगा कि छकौड़ी-बो की बकरी दुकानदार लाला की गाय शीशम वृक्ष की गिलहरी और नम्रता की छत पर बैठा कौआ सभी उसी को देखकर अपनी उदासी प्रकट कर रहे हैं।

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