उद्धरण - 383
बिन्नू तुम्हारी रामायन में हमारे मन की बातें लिखी है? तुम ही बताओं हमारे मन में सब कुछ उलटा काहे होता जा रहा है? अँधियारा ज्यों-ज्यों बढ़ता है भीतर जुन्हैया छिटकती जाती है। बिन्नू इँधेरे पाख में पूरनमासी का चाँद दिखाई देता है हमें। तुम कहती हो कि बियाबान डाँग में स्यार-बिलावों के सिवा कुछ नहीं। और हमें हमें तो देवताओं का बास लगता है इस गढ़ी में जंगल में और चारऊ तरफ।
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