उद्धरण - 499
एक मामूली आदमी नहीं जानता कि वह कभी कोई क्रान्तिकारी कार्य कर सकता है। वह अपने काम धन्धे ईर्ष्या-द्वेष सुख-दुख छोटी-छोटी चालाकियों में लिप्त रहकर फूँक-फूँककर आत्मरक्षात्मक कदम आगे बढ़ाता है तब आश्चर्य होता है कि कैसे यही लोग किसी संकटकालीन ऐतिहासिक मौके पर उठ खड़े होते हैं आगे मिलजुलकर जोर-जुल्म अन्याय गुलामी का विरोध करने के लिए घरों से बाहर निकल आते हैं।
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