उद्धरण - 528
लो जानेंगे नहीं? हम चले गए तो क्या अनपहचान हो गए? अपनी मट्टी की माया अलग होती है बेटा! मुख न दिखे तो भी क्या गन्ध-चिन्हार से सूँघ लेता है आदमी। बोली-बानी से तुरत चीन्ह लेता है…… उपेक्षित पड़े घर को उन्होंने ऐसा देखा जैसे बहुत दिनों से बिछुड़ा बालक गन्दा और मैला हुआ सहमा-सिकुड़ा सा खड़ा है। सुस्त और नाराज। अपनी माता से रूठा हुआ……. हम तो छाती से लगाकर रखते थे कि अपनी बाखर को। अरे इसी के मोह से मुक्त नहीं हो पाएं कितनी रातों जगे हैं। इस आँगन के विछोह में। लगता था पलकों में पराए आसमान की तरइयाँ करकराती है पिराती हैं आँखें।
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