उद्धरण - 361

बाप-बेटे आपस में कितना ही गुण रूप साम्य क्यों न रखते हों लेकिन उनमें एक मौलिक दृष्टि-भेद होता ही है। इसे बेटे की बाप के प्रति अवज्ञा नहीं माना जा सकता- और आरोपण तो वह किसी भी तरह है ही नहीं।

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